चिराड़ों का इतिहास संक्षेप में !

गहलोत वंश का महामंत्र यह :- जोहि राखे प्रण धर्म को तेहि राखे करतार !! अर्थात जिनका धर्म प्रण पर विशवास है भगवान उनके प्रण की रक्षा अवश्य करते है ! युक्त प्रदेश और अवध में गहलोतों का एक भेद चिराड राजपूतों का भी है जो चित्तोड़ राजपूत से चिराड राजपूत कहलाने लग गये ! चिराड़ों का पूर्वज सरदार गोविंदराव दिल्ली के महाप्रतापी पृथ्वीराज चौहान के साथ राजा जयचंद्र राठौड के साथ कन्नौज में लड़ने आया था और इनाम मैं १०८ गांव जो कानपुर के आस पास थे उन्हें मिले थे, उन्नाव में जो गहलोत है वे ओरंगजेब के समय में गये हुए है ! मिस्टर ग्रॉस ने अपने ग्रन्थ में लिखा है की यह वंश ब्रजमंडल मैं विशेष है और ब्रज में ये लोग शाह ,चौधरी, राव इन पदवियों से कहे जाते हैं ! राजा लक्ष्मण सिहं ने लिखा है कि बुलंद शहर के जिले में इनकी याद में एक गुहलोटि स्थान है ! कानपुर में यह लोग गौड़ राजपूत भी कहलाते हैं ! बिल्लौर के परगने मे ये लोग बहुत हैं !
 
क्षत्रिय – क्षत्रिय एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है शासन चलाने वाला ! ये हिन्दू वर्ण व्यवस्था की सबसे पहली ओर प्रमुख जाति है ! हिन्दू धर्म में क्षत्रिय जाति को सबसे ऊँचा माना जाता था ! हिन्दू समाज व्यवस्था में क्षत्रियों का काम देश पर शासन चलाना दिया गया है ! क्षत्रिय लोग बल, बुद्धि और विद्या तीनों में परांगत रहते हैं ! क्षत्रियों की कुर्बानियों के कारण आज हमारा भारत देश विश्व पटल पर सीना ताने खडा है ! भगवान श्री राम जी का जन्म क्षत्रिय जाति में हुआ था ! चिडार समाज के आदर्श श्रीराम है !
क्षत्रियों ने हज़ारों वर्षों से भारत पर राज किया और विदेशी ताकतों से जम कर लोहा लिया ! इतिहास के अनुसार आर्य ने अपने आप को चार वर्णों में विभक्त किया था – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ! महापद्य नंद ने आखरी क्षत्रिय राजा को मार दिया था इसके बाद सभी राजवंश गैर क्षत्रिय वंश से आये थे परन्तु कुछ विद्वान् चन्द्रगुप्त के वंश को भी क्षत्रिय मानते हैं !
माना जा सकता है की पहले ये गणतांत्रिक क्षत्रिय थे बाद मैं राजतांत्रिक हो गए, हर्षवर्धन वैश्य था, इसके बाद राजपूत आये जो क्षत्रिय होने का दावा करने लगे फिर जाट, मराठे, बुंदेले आदि गणतांत्रिक क्षत्रिय थे जिनका उद्देश्य गुप्त काल से मिलता है, बाद में बदन सिंह सूरजमल ने इन्हे राजतंत्र भरतपुर में बदल दिया इसके अलावा धौलपुर के राणा भी जाट है ! राजपूत रियासत में जयपुर, जोधपुर और जैसलमेर आदि राजस्थान से हैं ! जींद, कपूरथला, नाभा और पटियाला सिक्ख रियासत हैं !
 
चिराड वंश की वंशावली :- सौराष्ट्र गुजरात सोमनाथ महाद्वीप के द्वीप में है ! ब्रह्मा वाक्य है कि किसी समय में यहाँ चूरू नाम के राजा होंगे, उनके दो पुत्र पवार और चडार होंगे ! इन पुत्रों का राज्योचित शिक्षा पाये जाने के उपरांत ये दोनों राजकुमार बाहर भेजे गए ! राजा ने पवार को पंजाब और चडार को गुजरात भेजा ! पंडित छोटेलाल शर्मा ( लेखक – जाति अन्वेषण ) के अनुसार गहलोतों का एक भेद चिराड है जो की युक्त प्रदेश मे पाया जाता है और ये चित्तौड़ से गए हुए हैं !
१९२८ में अन्य समाज एवं वंशों के इतिहास के साथ साथ गहलोत या चिराड राजपूत वंश का इतिहास भी पंडित छोटे लाल शर्मा, एम. आर. एस. ( पुरातत्व विषारद व्याख्यान व महामंत्री हिन्दू वर्ण व्यवस्था ) मंडल फुलेरा राजस्थान द्वारा रचा गया और दयानंद मंत्रालय अजमेर राजस्थान में पंडित शिवदयाल द्वारा मुदिज कराया, प्रथम बार दो हज़ार जिल्दे छापकर तैयार की थी जिसमें छत्रिया प्रदीप के द्वितीय भाग में पेज क्रमांक ८०४ से ८०९ तक गहलोत राजपूत एवं गहलोत राजपूत के उपभेद या शाखा चिराड राजपूत वंश के पूर्व इतिहास का भी उल्लेख है जिसका विवरण वंश संख्या १७ गहलोत राजपूत वंश की श्रंखला में दिया गया है !
 
चडार क्षत्रिय समाज कौन है ? :- जिन्होंने हमारी भाषा, धर्म, सभ्यता एवं संस्कृति की युगों – युगों से सेवा की आज उनका ही सार्वजनिक ढंग से अपमान व अमूल्यन हो रहा है ! आर्य संतति राजपूत क्षत्रिय लोक मंगल पावन विधायक चरित्र के वे दीप्तिमान प्रदीप नक्षत्र हैं जिनके बराबर अपने को सभ्य समझने विश्व का कोई देश नहीं कर सकता ! पुराणों में जिन्हे चावडा राजपूत कहा गया, प्राचीन भारत के मध्यकाल में उन्हें प्रतिहार कहा गया है ! जो राम के पहरेदार लक्ष्मण को अपना पूर्व पुरुष मानते थे, पवार या परमार उनकी उपशाखा है ! चावडा का अपभृंष ही चडार है !
हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात ७ वी से १२ वी शताब्दी तक इस युग के राजाओं में जो सबसे प्रतापी थे, भारत की अरबों से अनवरत रक्षा करने के कारण इन्हे प्रतिहार कहा जाने लगा ! डॉ. आर. सी. मजुमदार ने लिखा है – की प्रतिहार साम्राज्य की याद दिलाता था और उसकी कुछ हद तक बराबरी तक करता था, उसने उत्तरी भारत में एकता स्थापित की फलतः सुख शांति आयी ! परन्तु उसका उद्देश्य इस बात में है की इसने होने वाले विदेशी आक्रमण का सफलतापूर्वक सामना किया जो इतिहास के लिए बड़ा योगदान समझना चाहिए !
नागभट्ट द्वितीय ने प्रतिहार वंश की स्थापना की ! वत्स राज नागभट्ट, मिहिरभोज और महेंद्रपाल प्रथम प्रतिहारों में योग्य शासक थे ! प्रतिहारों की शान और शक्ति की सबसे अच्छी गवाही अरबों की जोर स्तुति है जो शत्रु होते हुए भी उन्होंने प्रतिहारों के ऐश्वर्य और वीरता की प्रशंसा भारत के द्धारपाल कहकर की ! चूडावत गहलोतों की शाखा २४ शाखाओं में से एक थी जो चित्तौड के राणा लाखा के पुत्र सरकादर चूडा के वंशज थे और शिशोदियों की कुर्सी के रक्षक थे ! राजपूताना चित्तौड़गढ़ चित्तहाड कहलाते चिरहाङ से चिडार हो गए !
 
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